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Friday, 29 May 2015

Wo shaam Suhaani

"वो शाम सुहानी , मस्तानी ; जब दिल ने करी थी मनमानी ;
 Lonliness को दूर किया तब, friendship हमने कर डाली;

वो थोड़ी सी शरमाई थी, ना जाने क्यों घबराई थी;
काली-काली जुल्फ़ें उसकी, मानो बदरा घिर आई थी;
गूंगे-बहरे सा होकर मैं,बस उसको ही था देख रहा;
बिन हाथ लगाए whisky को,कैसी मदहोशी छायी थी;

क्या मुखड़ा था उस गोरी का,सरल-सलोनी छोरी का;
क्या मधुर बोल उसके निकले, ज्यों गीत सुना हो लोरी का;
अब शाम हो गयी हमें है चलना,सखी चलो जल्दी है चलना;
यों कहने लगी वो हड़बड़ में, ज्यों काम किया हो चोरी का;

Sense मुझे जल्दी से आया , पानी आँखों पे छिड़काया ;
अरे! तू कह दे , जो कहना है; दिल ने मेरे मुझे समझाया;
हिम्मत करले ,आगे बढ़ जा; आज मिला है मौका चल जा;
फिर  ना मिलेगा मौका ऐसा,आज अगर जो कह ना पाया;

हाथ हिलाकर उससे पूछा -"ज़रा सा सुनिए -क्या Time हुआ है?"
पीछे मुड़कर बोली madame -"घड़ी हाथ में और Time पूछा है;
होश में है या पिया हुआ है?"
तुम जैसों की ज़ात पता है,खोटी नीयत सब दीखता है;
जहाँ भी देखी Single लड़की , यूँ  friendly होने लगते कि
"किसी ने तुम्हे invite किया है ?"

shocked हो गया बिल्कुल मैं तो,बड़ी ही violent निकली ये तो;
हिम्मत करके उससे बोला , बाबा वाले ज्ञान को ढोला;
सही कहा है तुमने बिल्कुल,हम जैसों का राज़ है खोला;

Frankly saying तुम अच्छी हो,मुझे लगा था तुम catchy हो;

Single  मैं भी,तुम भी Single , इसीलिए "Shall we mingle ?"
मुझे नहीं experience कोई,school time से रहा हुँ single ;

तुम चाहो तो थप्पड़ जड़ दो,मुझ पर कई आरोप भी मढ़ दो;
पर जो सच है मैंने सुनाया, अब चाहो तो हामी भर दो;

नहीं ज़रूरी कि मैं तुमको,हर हफ़्ते Movie ले जाऊं;
नयी Bike में तुम्हे बिठाकर , Long -Drive  पर मैं ले जाऊं;
पर ये वादा है मेरा सुन लो, आँख में ना लाऊंगा आंसू;
जो कोई Tension  तेरी होगी, सबसे पहले मैं सुलझाऊँ;

इतना कह कर turn हुआ मैं,चलने को return हुआ मैं;

अभी चला था थोड़ी दूर , कि वो बोली "Shall we meet ?";
समय मुझे दो थोड़ा सा तुम, after that I'll  greet ;

तब तक Will you do a Favor , बदल गए थे उसके तेवर;
क्या मुझको तुम drop कर दोगे , can  we friend for forever ?;

यही कहानी,बड़ी सुहानी;जिस पर based है मेरी जवानी;

"वो शाम सुहानी , मस्तानी ; जब दिल ने करी थी मनमानी ;
 Lonliness को दूर किया तब, friendship हमने कर डाली;


  

Sunday, 1 February 2015





कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; 

जब जन्मे तब एक साथ थे, खेले तब भी एक साथ थे; 
खेत हमारे आस-पास थे, नदी और नाले साथ-साथ थे; 
गन्ने तेरे गुड़ मेरा था, सरसों तेरी साग मेरा था; 
चरती तेरी गायें जिसमें, हरा-भरा वो खेत मेरा था; 
तेरी होली रंग मेरा था, ईद मेरी और संग तेरा था; 
मन मुरीद जिससे हो जाए, आव-भगत का ढंग तेरा था; 
कपड़े मैंने तेरे पहने, खाना तूने मेरा खाया; 
भिन्न पंथ के होने पर भी, खुदा ने हमको ख़ूब मिलाया; 
पर पता किसे था दिन ऐसा भी, वो हमको दिखलायेगा; 
सदा चहकता पिंड मेरा ये, लाशों से पिट जाएगा; 
छोटी-छोटी गलियों में तब, लहू-सरिता का अविरल संचार हुआ था; 
कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; 

हाथ अगर थे, सर गायब था; 
कहीं बदन से, पैर गायब था; 
तिरछी नज़रें, जँहा से आती; 
नुक्कड़ वाला, घर गायब था; 
खेत तो थे, पर फसलें जल गयी; 
घर की नाली नदियां बन गयी; 
बड़-बड़ करती, 'बूढ़ी काकी'; 
घर की एक, दीवार पे टंग गयी; 
सुबह-शाम हर दरवाज़े से, केवल क्रंदन-गान हुआ  था; 
कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; '

Saturday, 20 December 2014

"हे वीर ! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !
आज फिर मौका आया है ;
हर क्षण पीड़ा को झेल रही भारत माँ ने ,
आज फिर तुझे बुलाया है;


हे लाल ! बुरा है हाल ,
मेरा अब तू ही सहारा है ;
इन रिपुओं  पर कर वार ,उठा तलवार !
मेरा अब तू ही सहारा है ;
हर संध्या भयभीत करे है ,और क्रंदन संगीत करे है ;
पता नहीं कब कौन चला दे,सीमा पर तलवार ;
अब और नहीं बलकार ,तुझे तेरी माँ ने बुलाया है ;
आज फिर मौका आया है;
हे वीर! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !


तेरा बचपन , मेरा जीवन ;
मेरा जीवन ,हाथ में तेरे ;
इसे बचाना कर्म है तेरा ;
खड़े है रिपुदल ,जिसको घेरे ;
लहू-सरिता  जब  बहती है ,आहत  मुझको कर देती है ;
लहू बहा हो चाहे जिसका ,होता छलनी मेरा सीना ;
वो भी मेरा तू भी मेरा ,तू सपूत और वो कपूत है ;
पर मैं ठहरी अबला माता ;जिसका मुश्किल हुआ है जीना ;
मेरा अंश ही ना जाने कब ,मुझ पर कर दे वार ;
अब तू ही उसे ललकार ,तुझे तेरी माँ ने बुलाया है;
आज फिर मौका आया है;


"हे वीर ! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !
आज फिर मौका आया है ;
हर क्षण पीड़ा को झेल रही भारत माँ ने ,
आज फिर तुझे बुलाया है;"

Sunday, 7 December 2014

लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;




जो तेरे गेसूं हिलते हैं , यूँ मानो बादल मिलते हैं ;
जो इनकी ख़ुश्बू आती है ,फ़िज़ा को महका जाती है;
नशीली आँखों में तेरी ,जंहा की मस्ती बस्ती है;
जो आँखें एक बार चख ले,तो फिर चखने को तरसती है;
हया भी आईने में जब , तेरा दीदार करती है ;
मुक़म्मल हो गयी है ज़न्नत , सैकड़ो बार कहती है; 
तेरी ख़िदमत अब मुझको , आज इक ज़ाहिद बनने दो ;
इबादतख़ाने में मेरे ,तेरी प्यारी सी मूरत हो;
मेरी इस पाक सी ख्वाईश को,कीमती सी फरमाइश को;
डाल कर झोली में मेरी,फ़क़ीरी को रुख़्सत कर दो;


लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;

Friday, 28 November 2014

भँवरे-भँवरे इधर तो आ ,कुछ ख़ास नहीं एक बात बता ;
हमें सुना तू अपनी प्यारी , मीठी -मीठी प्रेम कथा ;


भंवरा बोला:-


"एक उपवन में कई जीव थे,कुछ चलते और कुछ स्थिर ;
मैं भी उन संग रहने वाला ,वो भी उन संग रहने वाली ;
मेरा गुंजन उसे लुभाता ,उसकी महक से मैं मोहित ;
धीरे-धीरे लगा पनपने ,प्रेम अनूठा आलोकिक ;
जिसने उसको किया सुगंधित ,और हुआ मैं सम्मोहित ;
उसकी कोमल पंखुड़ियों से,रस की सरिता बहती थी;
मीठी-मीठी महक उसकी,जो प्राण मेरे हर लेती थी;
श्याम वर्ण में मुझे मिला ले;मेरे रस को अधर लगा ले;
लगे है पावन गुंजन तेरा , हर क्षण मुझसे कहती थी ;
रवि उदय के क्षण की आस ,अस्थिर हैं मेरे स्वास ;
कब आएंगे प्रियतम मेरे ,और मिटेगी मेरी प्यास ;
जल्दी आओ भ्रमर निराले,हर क्षण मुझसे कहती थी;
पर सब दिन होत ना एक समान , उपवन का भी हुआ नहीं;
मेरे प्रियतम को माली ने ,दूजा मौका दिया नहीं;
याद बड़ी उसकी है आती , जब उपवन पर नज़रें जाती;
जनम दुबारा लुंगी प्रियवर ,यही विधि की रीति थी;
कब देगा दर्शन यम के तू,मेरे ईश्वर मुझे बता ;
नए जन्म में फिर से होगा , प्रियतम मेरा  साथ सदा;
यही थी उसकी और मेरी;मीठी-मीठी प्रेम कथा; " 
जब तक तू मुझसे दूर थी , मैं  आदमी मतलब का था ;
अब जब तू मुझसे दूर थी, मतलब मेरा ही क्या रहा? 

सपनों में जब तू थी नहीं , रातों को सोता था सही ;
अब जब तू सपनों से गयी ,सोकर भी मैं सोता नहीं;