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Sunday, 1 February 2015





कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; 

जब जन्मे तब एक साथ थे, खेले तब भी एक साथ थे; 
खेत हमारे आस-पास थे, नदी और नाले साथ-साथ थे; 
गन्ने तेरे गुड़ मेरा था, सरसों तेरी साग मेरा था; 
चरती तेरी गायें जिसमें, हरा-भरा वो खेत मेरा था; 
तेरी होली रंग मेरा था, ईद मेरी और संग तेरा था; 
मन मुरीद जिससे हो जाए, आव-भगत का ढंग तेरा था; 
कपड़े मैंने तेरे पहने, खाना तूने मेरा खाया; 
भिन्न पंथ के होने पर भी, खुदा ने हमको ख़ूब मिलाया; 
पर पता किसे था दिन ऐसा भी, वो हमको दिखलायेगा; 
सदा चहकता पिंड मेरा ये, लाशों से पिट जाएगा; 
छोटी-छोटी गलियों में तब, लहू-सरिता का अविरल संचार हुआ था; 
कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; 

हाथ अगर थे, सर गायब था; 
कहीं बदन से, पैर गायब था; 
तिरछी नज़रें, जँहा से आती; 
नुक्कड़ वाला, घर गायब था; 
खेत तो थे, पर फसलें जल गयी; 
घर की नाली नदियां बन गयी; 
बड़-बड़ करती, 'बूढ़ी काकी'; 
घर की एक, दीवार पे टंग गयी; 
सुबह-शाम हर दरवाज़े से, केवल क्रंदन-गान हुआ  था; 
कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; '

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