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Sunday, 7 December 2014

लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;




जो तेरे गेसूं हिलते हैं , यूँ मानो बादल मिलते हैं ;
जो इनकी ख़ुश्बू आती है ,फ़िज़ा को महका जाती है;
नशीली आँखों में तेरी ,जंहा की मस्ती बस्ती है;
जो आँखें एक बार चख ले,तो फिर चखने को तरसती है;
हया भी आईने में जब , तेरा दीदार करती है ;
मुक़म्मल हो गयी है ज़न्नत , सैकड़ो बार कहती है; 
तेरी ख़िदमत अब मुझको , आज इक ज़ाहिद बनने दो ;
इबादतख़ाने में मेरे ,तेरी प्यारी सी मूरत हो;
मेरी इस पाक सी ख्वाईश को,कीमती सी फरमाइश को;
डाल कर झोली में मेरी,फ़क़ीरी को रुख़्सत कर दो;


लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;

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