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Tuesday, 18 March 2014

हृदयाघात से ज्यादा गहरी ,चोट दिल को पहुंचता है ;
जब अधनिकले से दांतो वाला ,बच्चा प्रशन दोहराता है;

मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक ,जो चाहूँ कर  सकता हूँ ;
तुम होते कौन हो कहनेवाले ,जैसे चाहूँ रह सकता हूँ;
जब देखो तब कहते रहते ,ये नहीं करना ,वो नहीं करना ;
यँहा ना जाना ,वँहा ना जाना ,
ये ना  खाना ,वो ना खाना ;
चाहते क्या हो , ये तो बता दो ;
क्यों व्यर्थ समस्या पैदा करते ?
जब लालन-पालन कर ना सको तो ;
क्यूँ व्यर्थ में बच्चे पैदा करते ?
बिन कुछ सोचे ,बिन कुछ जाने ,
मात-पिता  पर ,बच्चा उंगली उठाता है;
हृदयाघात से ज्यादा ………

अरे समझता क्यों नहीं मूरख ,
हमसे तू अलग नहीं ठहरा ;
दंभ भर रहा जिस पर इतना ,
हमसे मिला तुझे वो चेहरा ;
जिस शरीर का ध्यान तू रखता ,
है हिस्सा वो हम दोनों का ;
और अभिन्न अंग कहलाता है,
पिता का पौरुष ,माँ कि ममता ,
और भगवान कि माया ;
इन तीनों पर प्रश्न उठाकर ,
इतना दुःख पहुंचाता है ;
जब अधनिकले दांतो वाला ……………………  

Wednesday, 5 February 2014

ज़िन्दगी के ज़ख्मो से जूझता इक ज़िंदादिल ,
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी को ढूँढता इक ज़िंदादिल ;
चाहे कैसी भी समस्या आ  खड़ी हो सामने ,
हर समस्या का निवारण ढूँढता वो ज़िंदादिल ;

ठूंठ को देखा खड़ा तो , आ गयी उस पर दया;
तृष्णा से पीड़ित वृक्ष को ,भर के उसने जल दिया ;
चल दिया फिर वो दीवाना, चल दिया;
इस तरह से हर जड़ों में ,चेतना को ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
ज़िन्दगी के............................... 

सभ्यता कि ताक पर , है कई रिश्ते बने ;
संस्कृति कि आड़ में ,है कई बंगले खड़े खड़े ;
सत्यता की पीठ पीछे ,झूठ के जो बोल है;
इस तरह के सत्य में ,सत्यता को ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
मानवों के बीच मनु को,ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
ज़िन्दगी के जख्मों से ...................       
कोई  शहनाई  गूंजी  तो ,दिल-ए -गुलज़ार हो गया  ;
कोई बारात देखी  तो ,जवां ये हुस्न खिल गया ;

मुक्क़दर में अगर मौत ही है संगिनी मेरी ;
और तलाक़-ए -ज़िन्दगी है गर मेरा तोहफा ;
तो फिर मज़लिस ये कैसी काहे का धोखा ;
जनाजे के हूजुम में फिर से वो एहतराम  मिल गया ;
कोई शहनाई गूंजी तो ......................

शराफत का मोहल्ला रात भर करवट बदलता है ;
इनायत और प्रसंशा को सदा ही ये तरसता है ;
कोई ख़ाकी  सी वर्दी में तो कोई हथियारबंद दस्ता ;
उड़ा  कर धज्जियाँ इनकी यहाँ से पार  हो गया ;

कोई शहनाई गूंजी तो। …………………

भला उस कौम का मतलब रहा ही ज़िन्दगी में क्या ;
जो खुद अपनी नस्ल  का नासूर  बनती है ;
बुझाती है चरागो को शहर में रौशनदान बनती हैं ;
ग़मों कि महफिलों से कोई नगमा सा गूंजा तो ;
खामोश बैठे होठ को फ़साना सा मिल गया;
कोई शहनाई गूंजी तो ........
ज़िन्दगी के ज़ख्मो से जूझता इक ज़िंदादिल ,
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी को ढूँढता इक ज़िंदादिल ;
चाहे कैसी भी समस्या आ  खड़ी हो सामने ,
हर समस्या का निवारण ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
koi shehnai gunji to,dil-e-gulzar ho gaya;
koi barat dekhi to,jawa ye husn khil gaya;

mukkadar mein agar maut hi hai sangini meri;
aur talaq-e-zindagi hai gar mera tohfa;
toh fir mazlis ye kaisi,kahe ka dhoka;
janaje ke huzum mein fir se wo ehtaram mil gaya;
koi shehnai gunji to......................

sharafat ka muhalla,rat bhar karwat badalta hai;
inayat aur prasansa ko ,sada hi wo tarasta hai;
koi khakhi si wardi mein,to koi hathiyar band dasta;
uda kar dhajjiya inki,yaha se par ho gaya;

bhala us kaum ka matlab raha hi zindagi mein kya;
jo khud apni nasal ka nasur banti hai;
bujhati hai charago ko,sehar mein rausandan banti hai;
gamon ki mehfilo se ,gar koi nagma sa gunja to;
khamosh baithe hoth ko fasana mil gaya...........
koi shehnai gunji toh........

Tuesday, 4 February 2014

Zindagi ke jakhmo se jujhta ek zindadil,
zindagi mein zindagi ko dundhta ek zindadil,
chahe kaisi bhi samasya aa khadi ho samne ,
har samasaya ka niwaran dhundta wo zindadil........