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Friday, 28 November 2014

भँवरे-भँवरे इधर तो आ ,कुछ ख़ास नहीं एक बात बता ;
हमें सुना तू अपनी प्यारी , मीठी -मीठी प्रेम कथा ;


भंवरा बोला:-


"एक उपवन में कई जीव थे,कुछ चलते और कुछ स्थिर ;
मैं भी उन संग रहने वाला ,वो भी उन संग रहने वाली ;
मेरा गुंजन उसे लुभाता ,उसकी महक से मैं मोहित ;
धीरे-धीरे लगा पनपने ,प्रेम अनूठा आलोकिक ;
जिसने उसको किया सुगंधित ,और हुआ मैं सम्मोहित ;
उसकी कोमल पंखुड़ियों से,रस की सरिता बहती थी;
मीठी-मीठी महक उसकी,जो प्राण मेरे हर लेती थी;
श्याम वर्ण में मुझे मिला ले;मेरे रस को अधर लगा ले;
लगे है पावन गुंजन तेरा , हर क्षण मुझसे कहती थी ;
रवि उदय के क्षण की आस ,अस्थिर हैं मेरे स्वास ;
कब आएंगे प्रियतम मेरे ,और मिटेगी मेरी प्यास ;
जल्दी आओ भ्रमर निराले,हर क्षण मुझसे कहती थी;
पर सब दिन होत ना एक समान , उपवन का भी हुआ नहीं;
मेरे प्रियतम को माली ने ,दूजा मौका दिया नहीं;
याद बड़ी उसकी है आती , जब उपवन पर नज़रें जाती;
जनम दुबारा लुंगी प्रियवर ,यही विधि की रीति थी;
कब देगा दर्शन यम के तू,मेरे ईश्वर मुझे बता ;
नए जन्म में फिर से होगा , प्रियतम मेरा  साथ सदा;
यही थी उसकी और मेरी;मीठी-मीठी प्रेम कथा; " 

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