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Sunday, 23 March 2014

राग-रागिनी इतने छेड़े ,पर इनका कुछ न सका ;
उठा लिए कितनो ने बीड़े , पर इनका कुछ सका ;

इतने निष्ठुर ,इतने पापी ,

कुछ इंसा जो  बन से गए हैं ;
लगता है इस जनसँख्या में ,
कुछ रावण, कुछ कंस हुए हैं ;
स्वाभिमान और स्वविवेक की ,
निर्मम हत्या कर डाली ;
इतनी शिक्षा पा कर भी ,
मिटटी संग मिला  डाली ;
 इंसानो के वंशज होकर, भी  इनका कुछ हो न सका ;
उठा लिए कितनो ने बीड़े ,पर इनका कुछ हो न सका ;

छोटी-छोटी  नन्ही कलियाँ ,जो खिलने को आतुर हैं ;

भोली ,प्यारी सूरत इनकी बरबस मन को मोहे है ;
इस पर भी उन्हें तरस न आता ,खुद को जाने क्या है समझते ;
मर्द होने का दावा करके ,नपुंसको सा काम है करते ;
सज़ा सुनाएं इनको कैसी ,इसका निर्णय हो न सका ;
उठा लिए कितनो ने बीड़े , कुछ हो न सका ;

कभी-कभी रोना है आता ,और  आँखें भर जाती है ;

हमसे बेहतर पशु है लगते ,हम व्यर्थ सर्वोत्तम जाति है ;
कम से कम शिक्षा आभाव का,दुरुपयोग तो नहीं ये करते ;
पर ये पापी शिक्षित होकर ,ऐसे गंदे काम हैं करते ;
किन कर्मों को लक्ष्य बनाकर ऐसा जीवन  दिया ;
प्रभु से पूछे इस सवाल का ,उत्तर मुझको मिल न सका ;
उठा लिए कितनो ने बीड़े ,पर इनका कुछ हो न सका ;

राग-रागिनी  छेड़े,पर इनका कुछ हो न सका  ;

उठा लिए कितनो ने बीड़े ,पर इनका कुछ हो न सका ;

Tuesday, 18 March 2014

हृदयाघात से ज्यादा गहरी ,चोट दिल को पहुंचता है ;
जब अधनिकले से दांतो वाला ,बच्चा प्रशन दोहराता है;

मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक ,जो चाहूँ कर  सकता हूँ ;
तुम होते कौन हो कहनेवाले ,जैसे चाहूँ रह सकता हूँ;
जब देखो तब कहते रहते ,ये नहीं करना ,वो नहीं करना ;
यँहा ना जाना ,वँहा ना जाना ,
ये ना  खाना ,वो ना खाना ;
चाहते क्या हो , ये तो बता दो ;
क्यों व्यर्थ समस्या पैदा करते ?
जब लालन-पालन कर ना सको तो ;
क्यूँ व्यर्थ में बच्चे पैदा करते ?
बिन कुछ सोचे ,बिन कुछ जाने ,
मात-पिता  पर ,बच्चा उंगली उठाता है;
हृदयाघात से ज्यादा ………

अरे समझता क्यों नहीं मूरख ,
हमसे तू अलग नहीं ठहरा ;
दंभ भर रहा जिस पर इतना ,
हमसे मिला तुझे वो चेहरा ;
जिस शरीर का ध्यान तू रखता ,
है हिस्सा वो हम दोनों का ;
और अभिन्न अंग कहलाता है,
पिता का पौरुष ,माँ कि ममता ,
और भगवान कि माया ;
इन तीनों पर प्रश्न उठाकर ,
इतना दुःख पहुंचाता है ;
जब अधनिकले दांतो वाला ……………………  

Thursday, 6 March 2014

टुकड़ों में खुद को पेश किया , नाम तेरे यह वेष किया ;
फिर ना जाने क्या छूट गया ,जो तूने ना trace किया ;

प्रथम वर्ष में इस college के, मिला था मुझको golden chance;
freshers वाली रात में उसको ,पहली बार किया था glance;
search अभियान हुआ शुरू फिर , नाम branch सब पता किया;
दो - तीन दिन में class में उसकी,जासूसों को नियुक्त किया ;
प्रभु दया से सारा system, दो -तीन महिने सही चला ;
कभी lab, तो कभी class के बाहर उसको खड़ा मिला ;
eye contact बहुत हो गया , अब कुछ solid करना था ;
front of her ,friendship को अपनी ,अब promote तो करना था;
library में मिली अकेली ,मैंने कहा जी दोस्ती करलो ;
रुखा सा reply आया ,
नहीं जानती हुँ मैं तुमको , और तुम कहते दोस्ती करलो ;
अब मुशकिल लग रहा था मुझको , प्रेम प्रसंग का extension;
बार -बार ignorance उसका ,दिला रहा hypertension;
कितने पापड़ बेले मैंने ,एक साल होने को आया ;
इधर -उधर से search-वर्च कर ,मैंने उसका नंबर पाया;
नंबर मिला तो b'day आया ,
mid-term की तैयारी छोड़ ,उसके लिए gift बनाया ;
जाने किस मिटटी कि थी वो ,यह भी उसको रास ना आया;
उससे friendship करने खातिर ,
उसकी class के हर बच्चे को मैंने अपना दोस्त बनाया ; 
उसकी एक झलक कि खातिर ,
2nd sem के हर paper को ,ढाई घंटे में छोड़ के आया ;
तीन साल हो गए हैं देखो,अब भी हालत वही रही ;
वर्षों पहले भेजी request, आज भी accept नहीं हुई ;

तेरे खातिर career अपना खुद हाथों से crash किया ;
फिर न जाने  क्या छूट गया ,जो तूने ना trace किया ;