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Wednesday, 5 February 2014

ज़िन्दगी के ज़ख्मो से जूझता इक ज़िंदादिल ,
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी को ढूँढता इक ज़िंदादिल ;
चाहे कैसी भी समस्या आ  खड़ी हो सामने ,
हर समस्या का निवारण ढूँढता वो ज़िंदादिल ;

ठूंठ को देखा खड़ा तो , आ गयी उस पर दया;
तृष्णा से पीड़ित वृक्ष को ,भर के उसने जल दिया ;
चल दिया फिर वो दीवाना, चल दिया;
इस तरह से हर जड़ों में ,चेतना को ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
ज़िन्दगी के............................... 

सभ्यता कि ताक पर , है कई रिश्ते बने ;
संस्कृति कि आड़ में ,है कई बंगले खड़े खड़े ;
सत्यता की पीठ पीछे ,झूठ के जो बोल है;
इस तरह के सत्य में ,सत्यता को ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
मानवों के बीच मनु को,ढूँढता वो ज़िंदादिल ;
ज़िन्दगी के जख्मों से ...................       

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