वो लड़की
हम अक्सर उस मोड़ पे ,रूकते हैं;
और उस खिड़की को,तकते हैं;
जहाँ वर्षों पहले वो लड़की;
बालों को सुखाया करती थी;
जब कदम चुमते हैं,उस पथ को;
जो जाता था उसके घर को;
सिहरन दिल में उठती ऐसी;
मानो छुआ हो,ज्यों बिजली को;
आगे चल कर हम,रूकते हैं,
और उस मंदिर को , तकते हैं,
जहाँ वर्षों पहले वो लड़की,
भोले की पूजा करती थी;
मंदिर के आगे है,वो बगीचा;
ध्यान सदा जिसने है खींचा;
फूल फलों से भरा पड़ा है;
और उसका झूला है नीचा;
अंदर जा कर ,हम रूकते हैं;
और उस झूले को ,तकते हैं;
जहाँ वर्षों पहले ,वो लड़की;
मस्ती में, झूला करती थी;
अब बस उसका,घर आया है;
आज जिसे ,खंडहर पाया है;
कभी चहकता था, जो दिनभर;
आज वहाँ, सूना साया है;
घर के बाहर ,हम रूकते हैं;
और उस छज्जे , को तकते हैं;
जहाँ वर्षों पहले ,वो लड़की;
नज़रों को , चुराया करती थी;
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