शायरी
"वो बुर्क़ा भी हो गया काला , ज़माने की नज़रें ले ले
कर;
शायद ख़ुदा भी फ़क़ीर हो गया,तुझे ऐसा हुस्न दे दे कर;
गिला ये नहीं हमें, कि हम अधूरे हैं;
अरे ! हम तो थक गए हैं; वफ़ादारी का इंम्तेहाँ दे दे कर;"
"उनकी अदाएं भी क़ातिलाना है,
और जुल्फें भी
पहली बिजलियाँ गिराती है , तो
दूसरी बरसात लाती है;"
"उनकी दस्तक़ का इंतेज़ार
हम करते रहे,
वो आएंगे , ये सोच दरवाज़े
दीदार हम करते रहे;
पर शायद भूल गए थे हम , कि वो
तो बेवफ़ा हैं;
और हम उनका ऐतबार करते
रहे;"
"कोई मशग़ूल खुद में इस
क़दर हुआ है ;
कि वो अपना भी गैर सा हुआ है;
ना इल्म है उसे , और ना ही
ख़बर है ;
कि उसकी याद में
ये गैर, ज़िंदा रहकर भी मुर्दे सा हुआ है;"
"ख्वाईश नहीं कि जंहा को
अपना बनाऊं;
ख्वाईश नहीं कि सबके
दिल-ओ-दिमाग पर छा जाऊं;
ख्वाईश नहीं कि शान-ओ-शौहरत
पाऊं;
बस आरज़ू तो ज़रा सी है कि ,
आदम की औलाद हुँ , खुद को आदमी
साबित कर जाऊं;"
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