कोई शहनाई गूंजी तो ,दिल-ए -गुलज़ार हो गया ;
कोई बारात देखी तो ,जवां ये हुस्न खिल गया ;
मुक्क़दर में अगर मौत ही है संगिनी मेरी ;
और तलाक़-ए -ज़िन्दगी है गर मेरा तोहफा ;
तो फिर मज़लिस ये कैसी काहे का धोखा ;
जनाजे के हूजुम में फिर से वो एहतराम मिल गया ;
कोई शहनाई गूंजी तो ......................
शराफत का मोहल्ला रात भर करवट बदलता है ;
इनायत और प्रसंशा को सदा ही ये तरसता है ;
कोई ख़ाकी सी वर्दी में तो कोई हथियारबंद दस्ता ;
उड़ा कर धज्जियाँ इनकी यहाँ से पार हो गया ;
कोई शहनाई गूंजी तो। …………………
भला उस कौम का मतलब रहा ही ज़िन्दगी में क्या ;
जो खुद अपनी नस्ल का नासूर बनती है ;
बुझाती है चरागो को शहर में रौशनदान बनती हैं ;
ग़मों कि महफिलों से कोई नगमा सा गूंजा तो ;
खामोश बैठे होठ को फ़साना सा मिल गया;
कोई शहनाई गूंजी तो ........
कोई बारात देखी तो ,जवां ये हुस्न खिल गया ;
मुक्क़दर में अगर मौत ही है संगिनी मेरी ;
और तलाक़-ए -ज़िन्दगी है गर मेरा तोहफा ;
तो फिर मज़लिस ये कैसी काहे का धोखा ;
जनाजे के हूजुम में फिर से वो एहतराम मिल गया ;
कोई शहनाई गूंजी तो ......................
शराफत का मोहल्ला रात भर करवट बदलता है ;
इनायत और प्रसंशा को सदा ही ये तरसता है ;
कोई ख़ाकी सी वर्दी में तो कोई हथियारबंद दस्ता ;
उड़ा कर धज्जियाँ इनकी यहाँ से पार हो गया ;
कोई शहनाई गूंजी तो। …………………
भला उस कौम का मतलब रहा ही ज़िन्दगी में क्या ;
जो खुद अपनी नस्ल का नासूर बनती है ;
बुझाती है चरागो को शहर में रौशनदान बनती हैं ;
ग़मों कि महफिलों से कोई नगमा सा गूंजा तो ;
खामोश बैठे होठ को फ़साना सा मिल गया;
कोई शहनाई गूंजी तो ........
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