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Tuesday, 18 March 2014

हृदयाघात से ज्यादा गहरी ,चोट दिल को पहुंचता है ;
जब अधनिकले से दांतो वाला ,बच्चा प्रशन दोहराता है;

मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक ,जो चाहूँ कर  सकता हूँ ;
तुम होते कौन हो कहनेवाले ,जैसे चाहूँ रह सकता हूँ;
जब देखो तब कहते रहते ,ये नहीं करना ,वो नहीं करना ;
यँहा ना जाना ,वँहा ना जाना ,
ये ना  खाना ,वो ना खाना ;
चाहते क्या हो , ये तो बता दो ;
क्यों व्यर्थ समस्या पैदा करते ?
जब लालन-पालन कर ना सको तो ;
क्यूँ व्यर्थ में बच्चे पैदा करते ?
बिन कुछ सोचे ,बिन कुछ जाने ,
मात-पिता  पर ,बच्चा उंगली उठाता है;
हृदयाघात से ज्यादा ………

अरे समझता क्यों नहीं मूरख ,
हमसे तू अलग नहीं ठहरा ;
दंभ भर रहा जिस पर इतना ,
हमसे मिला तुझे वो चेहरा ;
जिस शरीर का ध्यान तू रखता ,
है हिस्सा वो हम दोनों का ;
और अभिन्न अंग कहलाता है,
पिता का पौरुष ,माँ कि ममता ,
और भगवान कि माया ;
इन तीनों पर प्रश्न उठाकर ,
इतना दुःख पहुंचाता है ;
जब अधनिकले दांतो वाला ……………………  

4 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. बहुत उत्कृष्ट लेखनी ! वाह !!

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    1. thanx buddy
      many others of mah poem are waiting for ur comments

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