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Sunday, 18 May 2014

ये मेरा दिल भी इतना क्यूँ ,तड़पता तेरी ख़ातिर  है ;
ये मेरा दिल भी इतना क्यूँ, मचलता तेरी ख़ातिर  है ;

तू समझे ना कि तुझको पसन्द , इतना क्यूँ  करता हूँ ;
तू माने या न माने , मैं सिर्फ तुझ पर ही मरता हूँ ;
तेरी सूरत मेरे मन की दुनिया में बनी मूरत ;
तू समझेगी नहीं फिर भी रगों में खून बहता तेरी खातिर है ;
ये मेरा दिल भी इतना क्यूँ ,तड़पता तेरी ख़ातिर  है ;

निशा में चाँद जो चमके , रौशनी जग में होती है ;
परन्तु चाँद में खुद की ,रौशनी शुन्य होती है ;
सहारा सूर्य का लेकर निखरता है हमेशा वो;
इस निखरते चाँद का सूरज बेशक़ तू मेरी ख़ातिर है ;
 ये मेरा दिल भी इतना क्यूँ ,तड़पता तेरी ख़ातिर  है ;

जो इतना तू संभलती है नए रिश्ते बनाने में ;
जो इतना तू ठहरती  है नयी मंज़िल को  में;
जो इतना तू हिचकती है किसी से बोल पाने में;
ये तेरा हिचकिचाना ही बढ़ाता चाह मेरी तेरे खातिर है ;
ये मेरा दिल भी इतना क्यूँ ,तड़पता तेरी ख़ातिर  है ;

ज़माना कोसता मुझको तू इतना क्यूँ  तड़पता है;
लबों पे मुस्कराहट रख अकेले क्यूँ सुलगता है;
जो तेरी थी नहीं पगले तू उसको पायेगा कैसे ;
मैं कहता मर के जीना भी मेरा अब  ख़ातिर है;
ये मेरा दिल भी इतना क्यूँ ,तड़पता तेरी ख़ातिर  है ;

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