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Saturday, 20 December 2014

"हे वीर ! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !
आज फिर मौका आया है ;
हर क्षण पीड़ा को झेल रही भारत माँ ने ,
आज फिर तुझे बुलाया है;


हे लाल ! बुरा है हाल ,
मेरा अब तू ही सहारा है ;
इन रिपुओं  पर कर वार ,उठा तलवार !
मेरा अब तू ही सहारा है ;
हर संध्या भयभीत करे है ,और क्रंदन संगीत करे है ;
पता नहीं कब कौन चला दे,सीमा पर तलवार ;
अब और नहीं बलकार ,तुझे तेरी माँ ने बुलाया है ;
आज फिर मौका आया है;
हे वीर! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !


तेरा बचपन , मेरा जीवन ;
मेरा जीवन ,हाथ में तेरे ;
इसे बचाना कर्म है तेरा ;
खड़े है रिपुदल ,जिसको घेरे ;
लहू-सरिता  जब  बहती है ,आहत  मुझको कर देती है ;
लहू बहा हो चाहे जिसका ,होता छलनी मेरा सीना ;
वो भी मेरा तू भी मेरा ,तू सपूत और वो कपूत है ;
पर मैं ठहरी अबला माता ;जिसका मुश्किल हुआ है जीना ;
मेरा अंश ही ना जाने कब ,मुझ पर कर दे वार ;
अब तू ही उसे ललकार ,तुझे तेरी माँ ने बुलाया है;
आज फिर मौका आया है;


"हे वीर ! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !
आज फिर मौका आया है ;
हर क्षण पीड़ा को झेल रही भारत माँ ने ,
आज फिर तुझे बुलाया है;"

Sunday, 7 December 2014

लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;




जो तेरे गेसूं हिलते हैं , यूँ मानो बादल मिलते हैं ;
जो इनकी ख़ुश्बू आती है ,फ़िज़ा को महका जाती है;
नशीली आँखों में तेरी ,जंहा की मस्ती बस्ती है;
जो आँखें एक बार चख ले,तो फिर चखने को तरसती है;
हया भी आईने में जब , तेरा दीदार करती है ;
मुक़म्मल हो गयी है ज़न्नत , सैकड़ो बार कहती है; 
तेरी ख़िदमत अब मुझको , आज इक ज़ाहिद बनने दो ;
इबादतख़ाने में मेरे ,तेरी प्यारी सी मूरत हो;
मेरी इस पाक सी ख्वाईश को,कीमती सी फरमाइश को;
डाल कर झोली में मेरी,फ़क़ीरी को रुख़्सत कर दो;


लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;