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Tuesday, 28 June 2016

वो लड़की


वो लड़की



हम अक्सर उस मोड़ पे ,रूकते हैं;
और उस खिड़की को,तकते हैं;
जहाँ वर्षों पहले वो लड़की;
बालों को सुखाया करती थी;


जब कदम चुमते हैं,उस पथ को;
जो जाता था उसके घर को;
सिहरन दिल में उठती ऐसी;
मानो छुआ हो,ज्यों बिजली को;
आगे चल कर हम,रूकते हैं,
और उस मंदिर को , तकते हैं,
जहाँ वर्षों पहले वो लड़की,
भोले की पूजा करती थी;


मंदिर के आगे है,वो बगीचा;
ध्यान सदा जिसने है खींचा;
फूल फलों से भरा पड़ा है;
और उसका झूला है नीचा;
अंदर जा कर ,हम रूकते हैं;
और उस झूले को ,तकते हैं;
जहाँ वर्षों पहले ,वो लड़की;
मस्ती में, झूला करती थी;


अब बस उसका,घर आया है;
आज जिसे ,खंडहर पाया है;
कभी चहकता था, जो दिनभर;
आज वहाँ, सूना साया है;
घर के बाहर ,हम रूकते हैं;
और उस छज्जे , को तकते हैं;
जहाँ वर्षों पहले ,वो लड़की;
नज़रों को , चुराया करती थी;

Sunday, 7 June 2015





शायरी

 

"वो बुर्क़ा भी हो गया  काला , ज़माने की नज़रें ले ले कर;

शायद ख़ुदा भी फ़क़ीर हो गया,तुझे ऐसा हुस्न दे दे कर;

गिला ये नहीं हमें, कि हम अधूरे हैं;

अरे ! हम तो थक गए हैं; वफ़ादारी का इंम्तेहाँ दे दे कर;"

 

 

"उनकी अदाएं भी क़ातिलाना है, और जुल्फें भी

पहली बिजलियाँ गिराती है , तो दूसरी बरसात लाती है;"

 

 

"उनकी दस्तक़ का इंतेज़ार हम करते रहे,

वो आएंगे , ये सोच दरवाज़े  दीदार हम करते रहे;

पर शायद भूल गए थे हम , कि वो तो बेवफ़ा हैं;

और हम उनका ऐतबार करते रहे;"

 

 

"कोई मशग़ूल खुद में इस क़दर हुआ है ;

कि वो अपना भी गैर सा हुआ है;

ना इल्म है उसे , और ना ही ख़बर है ;

कि उसकी याद में ये गैर, ज़िंदा रहकर भी मुर्दे सा हुआ  है;"

 

 

 

"ख्वाईश नहीं कि जंहा को अपना बनाऊं;

ख्वाईश नहीं कि सबके दिल-ओ-दिमाग  पर छा जाऊं;

ख्वाईश नहीं कि शान-ओ-शौहरत पाऊं;

बस आरज़ू तो ज़रा सी है कि ,

आदम की औलाद हुँ , खुद को आदमी साबित कर जाऊं;"


Friday, 29 May 2015

Wo shaam Suhaani

"वो शाम सुहानी , मस्तानी ; जब दिल ने करी थी मनमानी ;
 Lonliness को दूर किया तब, friendship हमने कर डाली;

वो थोड़ी सी शरमाई थी, ना जाने क्यों घबराई थी;
काली-काली जुल्फ़ें उसकी, मानो बदरा घिर आई थी;
गूंगे-बहरे सा होकर मैं,बस उसको ही था देख रहा;
बिन हाथ लगाए whisky को,कैसी मदहोशी छायी थी;

क्या मुखड़ा था उस गोरी का,सरल-सलोनी छोरी का;
क्या मधुर बोल उसके निकले, ज्यों गीत सुना हो लोरी का;
अब शाम हो गयी हमें है चलना,सखी चलो जल्दी है चलना;
यों कहने लगी वो हड़बड़ में, ज्यों काम किया हो चोरी का;

Sense मुझे जल्दी से आया , पानी आँखों पे छिड़काया ;
अरे! तू कह दे , जो कहना है; दिल ने मेरे मुझे समझाया;
हिम्मत करले ,आगे बढ़ जा; आज मिला है मौका चल जा;
फिर  ना मिलेगा मौका ऐसा,आज अगर जो कह ना पाया;

हाथ हिलाकर उससे पूछा -"ज़रा सा सुनिए -क्या Time हुआ है?"
पीछे मुड़कर बोली madame -"घड़ी हाथ में और Time पूछा है;
होश में है या पिया हुआ है?"
तुम जैसों की ज़ात पता है,खोटी नीयत सब दीखता है;
जहाँ भी देखी Single लड़की , यूँ  friendly होने लगते कि
"किसी ने तुम्हे invite किया है ?"

shocked हो गया बिल्कुल मैं तो,बड़ी ही violent निकली ये तो;
हिम्मत करके उससे बोला , बाबा वाले ज्ञान को ढोला;
सही कहा है तुमने बिल्कुल,हम जैसों का राज़ है खोला;

Frankly saying तुम अच्छी हो,मुझे लगा था तुम catchy हो;

Single  मैं भी,तुम भी Single , इसीलिए "Shall we mingle ?"
मुझे नहीं experience कोई,school time से रहा हुँ single ;

तुम चाहो तो थप्पड़ जड़ दो,मुझ पर कई आरोप भी मढ़ दो;
पर जो सच है मैंने सुनाया, अब चाहो तो हामी भर दो;

नहीं ज़रूरी कि मैं तुमको,हर हफ़्ते Movie ले जाऊं;
नयी Bike में तुम्हे बिठाकर , Long -Drive  पर मैं ले जाऊं;
पर ये वादा है मेरा सुन लो, आँख में ना लाऊंगा आंसू;
जो कोई Tension  तेरी होगी, सबसे पहले मैं सुलझाऊँ;

इतना कह कर turn हुआ मैं,चलने को return हुआ मैं;

अभी चला था थोड़ी दूर , कि वो बोली "Shall we meet ?";
समय मुझे दो थोड़ा सा तुम, after that I'll  greet ;

तब तक Will you do a Favor , बदल गए थे उसके तेवर;
क्या मुझको तुम drop कर दोगे , can  we friend for forever ?;

यही कहानी,बड़ी सुहानी;जिस पर based है मेरी जवानी;

"वो शाम सुहानी , मस्तानी ; जब दिल ने करी थी मनमानी ;
 Lonliness को दूर किया तब, friendship हमने कर डाली;


  

Sunday, 1 February 2015





कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; 

जब जन्मे तब एक साथ थे, खेले तब भी एक साथ थे; 
खेत हमारे आस-पास थे, नदी और नाले साथ-साथ थे; 
गन्ने तेरे गुड़ मेरा था, सरसों तेरी साग मेरा था; 
चरती तेरी गायें जिसमें, हरा-भरा वो खेत मेरा था; 
तेरी होली रंग मेरा था, ईद मेरी और संग तेरा था; 
मन मुरीद जिससे हो जाए, आव-भगत का ढंग तेरा था; 
कपड़े मैंने तेरे पहने, खाना तूने मेरा खाया; 
भिन्न पंथ के होने पर भी, खुदा ने हमको ख़ूब मिलाया; 
पर पता किसे था दिन ऐसा भी, वो हमको दिखलायेगा; 
सदा चहकता पिंड मेरा ये, लाशों से पिट जाएगा; 
छोटी-छोटी गलियों में तब, लहू-सरिता का अविरल संचार हुआ था; 
कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; 

हाथ अगर थे, सर गायब था; 
कहीं बदन से, पैर गायब था; 
तिरछी नज़रें, जँहा से आती; 
नुक्कड़ वाला, घर गायब था; 
खेत तो थे, पर फसलें जल गयी; 
घर की नाली नदियां बन गयी; 
बड़-बड़ करती, 'बूढ़ी काकी'; 
घर की एक, दीवार पे टंग गयी; 
सुबह-शाम हर दरवाज़े से, केवल क्रंदन-गान हुआ  था; 
कंट-जड़ित माला से, जब श्रृंगार हुआ था; 
एक बहुभाषीय देश में, भीषण नरसंघार हुआ था; '

Saturday, 20 December 2014

"हे वीर ! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !
आज फिर मौका आया है ;
हर क्षण पीड़ा को झेल रही भारत माँ ने ,
आज फिर तुझे बुलाया है;


हे लाल ! बुरा है हाल ,
मेरा अब तू ही सहारा है ;
इन रिपुओं  पर कर वार ,उठा तलवार !
मेरा अब तू ही सहारा है ;
हर संध्या भयभीत करे है ,और क्रंदन संगीत करे है ;
पता नहीं कब कौन चला दे,सीमा पर तलवार ;
अब और नहीं बलकार ,तुझे तेरी माँ ने बुलाया है ;
आज फिर मौका आया है;
हे वीर! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !


तेरा बचपन , मेरा जीवन ;
मेरा जीवन ,हाथ में तेरे ;
इसे बचाना कर्म है तेरा ;
खड़े है रिपुदल ,जिसको घेरे ;
लहू-सरिता  जब  बहती है ,आहत  मुझको कर देती है ;
लहू बहा हो चाहे जिसका ,होता छलनी मेरा सीना ;
वो भी मेरा तू भी मेरा ,तू सपूत और वो कपूत है ;
पर मैं ठहरी अबला माता ;जिसका मुश्किल हुआ है जीना ;
मेरा अंश ही ना जाने कब ,मुझ पर कर दे वार ;
अब तू ही उसे ललकार ,तुझे तेरी माँ ने बुलाया है;
आज फिर मौका आया है;


"हे वीर ! उठा शमशीर ! बदल तक़दीर !
आज फिर मौका आया है ;
हर क्षण पीड़ा को झेल रही भारत माँ ने ,
आज फिर तुझे बुलाया है;"

Sunday, 7 December 2014

लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;




जो तेरे गेसूं हिलते हैं , यूँ मानो बादल मिलते हैं ;
जो इनकी ख़ुश्बू आती है ,फ़िज़ा को महका जाती है;
नशीली आँखों में तेरी ,जंहा की मस्ती बस्ती है;
जो आँखें एक बार चख ले,तो फिर चखने को तरसती है;
हया भी आईने में जब , तेरा दीदार करती है ;
मुक़म्मल हो गयी है ज़न्नत , सैकड़ो बार कहती है; 
तेरी ख़िदमत अब मुझको , आज इक ज़ाहिद बनने दो ;
इबादतख़ाने में मेरे ,तेरी प्यारी सी मूरत हो;
मेरी इस पाक सी ख्वाईश को,कीमती सी फरमाइश को;
डाल कर झोली में मेरी,फ़क़ीरी को रुख़्सत कर दो;


लबों को हरक़त दे दो , ज़रा सी ज़हमत कर दो;
इश्क़ की बंदगी में खुद को,आज तुम क़ुर्बत कर दो;
मिला कर जिस्म को रूह से , रूमानी इश्क़ को दिल से;
धड़कते दिल की धड़कन को,आज तुम सरगम दे दो;